वाराणसी। भारत रत्न बाबासाहेब डॉ भीमराव रामजी आंबेडकर की 135वीं जयंती के उपलक्ष्य पर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जन-संप्रेषण विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन बुधवार को हुआ। “बाबासाहेब आंबेडकर की पत्रकारिता : सामाजिक न्याय और भारतीय समाज का रूपांतरण” विषयक इस संगोष्ठी में देश-विदेश के विद्वानों ने सक्रिय सहभागिता की।
अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में दो दिनों में 10 सत्रों में 135 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए।

समापन सत्र के मुख्य अतिथि कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय रायपुर के कुलपति प्रो. मनोज दयाल ने कहा कि पत्रकारिता केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों को सशक्त करने का एक प्रभावी और उत्तरदायी उपकरण है। मीडिया की भूमिका केवल खबरें पहुंचाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसे समाज में जागरूकता, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को बढ़ावा देना चाहिए। भीमराव रामजी आंबेडकर की पत्रकारिता हमें सिखाती है कि किस प्रकार मीडिया वंचित और हाशिए पर खड़े वर्गों की आवाज बन सकता है। आज के दौर में जब मीडिया कई चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब आंबेडकर के सिद्धांत पत्रकारिता के लिए नैतिक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।

मुख्य वक्ता भारती विद्यापीठ नई दिल्ली के निदेशक प्रो. एम. एन. होदा ने कहा कि आंबेडकर का चिंतन केवल सामाजिक न्याय तक सीमित नहीं था, बल्कि वह बौद्धिक और वैचारिक क्रांति का प्रतीक है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि पत्रकारिता को घटनाओं की रिपोर्टिंग से आगे बढ़कर सामाजिक सरोकारों पर गंभीर विमर्श करना चाहिए।
विशिष्ट वक्ता एपिजे इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन के निदेशक प्रो. सजल मुखर्जी ने हिंदी सिनेमा के माध्यम से नैरेटिव निर्माण की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए कहा कि सिनेमा समाज की सोच को प्रभावित करने वाला सशक्त माध्यम है। उन्होंने बताया कि किस प्रकार फिल्में सामाजिक यथार्थ को प्रस्तुत करते हुए जनमत निर्माण में भूमिका निभाती हैं
समापन सत्र की अध्यक्षता शिवाजी विश्वविद्यालय के पत्रकारिता और जान संप्रेषण विभाग की अध्यक्ष प्रोफेसर निशा पवार ने किया। इस अवसर पर उन्होंने बदलते परिदृश्य में बाबा साहब अंबेडकर की पत्रकारिता के बदलते को आत्मसात करते हुए पत्रकारिता करने पर बोल दिया। उन्होंने कहा कि आंबेडकर की पत्रकारिता आज भी प्रासंगिक है और वर्तमान मीडिया को उनके सिद्धांतों से प्रेरणा लेकर समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की दिशा में कार्य करना चाहिए।
विभिन्न सत्रों में प्रतिभागियों ने आंबेडकर की पत्रकारिता, सामाजिक न्याय, मीडिया की भूमिका और समकालीन चुनौतियों पर गहन चर्चा की।
अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में विभिन्न देशों के शिक्षाविद हिस्सा लिया जिनमें अर्जेंटीना के प्रोफेसर फ्रांसिस्को, यूएनएस यूनेस्को एक्सपर्ट और एस्टोनिया के प्रोफेसर जॉन हाल ब्रुक, मलेशिया के प्रोफेसर सारलो विल्सन मास्को स्टेट यूनिवर्सिटी रशिया की डॉ आना ग्लादकोवा, नेपाल की पूर्व मंत्री और यून न वूमेन की पूर्व सलाहकार डॉ बिमला राय पड़ियाल, यूथ एशिया नेपाल के अध्यक्ष डॉ संतोष शाह, त्रिभुवन विश्वविद्यालय काठमांडू के प्रोफेसर कुंदन आर्यन बांग्लादेश के प्रति कुलपति डॉ जुडे विलियम ज्ञानिलो सहित अनेक अंतर्राष्ट्रीय विद्वान शामिल हैं।
विभिन्न सत्रों की अध्यक्षता करने वालों में प्रोफेसर अनुराग दवे, प्रोफेसर ज्ञान प्रकाश मिश्रा, प्रोफेसर हरीश कुमार, प्रोफेसर सुरेश चंद्र नायक, प्रोफेसर अनिल उपाध्याय, प्रोफेसर ओम प्रकाश सिंह, प्रोफेसर संजीव भाणावत आदि के नाम प्रमुख हैं।
आयोजन सचिव डॉ बाला लखेंद्र ने सभी प्रतिभागियों को धन्यवाद ज्ञापित किया।


